हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की आवश्यक शर्तें

हिंदुओं के मध्य विवाह कोई संविदा नहीं एक संस्कार है विवाह के बारे में हिंदुओं में यह कहा जाता है कि विवाह जन्म जन्मांतर का बंधन है और यह जन्म से पूर्व में ही तय हो जाता है जन्म के बाद मूर्त रूप धारण कर लेता है विवाह की वर्तमान आवश्यक शर्तों को समझने के लिए हमें हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की संबंधित प्रावधानों का अवलोकन करना होगा इस विषय में संपूर्ण जानकारी के लिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 से पूर्व की स्थिति का अवलोकन करना होगा

हिंदू विधि के पूर्व विवाह की स्थिति-
धार्मिक हिंदू विधि के अंतर्गत एक बैध हिंदू विवाह के लिए निम्नलिखित शब्दों का पूरा होना अति आवश्यक था ।

  1. वर तथा वधू एक ही जाति के होने चाहिए

2. वर तथा वधू के संबंधों या नातेदारी से प्रतिबंधित श्रेणी से परे होना चाहिए अर्थात यह आवश्यक था कि वर तथा वधू नातेदारी की श्रेणी के अंतर्गत में न हो ।

3. हिंदू विवाह के सभी उचित समारोहों का पालन हुआ हुआ अर्थात हिंदू विवाह के लिए आवश्यक सभी समारोह संपन्न हुए हो ।
नोट – प्राचीन हिंदू धर्म में प्रतिलोम विवाह पर प्रतिबंध था अर्थात निम्न जाति की पुरुष तथा उच्च जाति की महिला के मध्य विवाह पर प्रतिबंध था परंतु अनुलोम विवाह की अनुमति थी अर्थात उच्च जाति की पुरुष तथा निम्न जाति की स्त्री के मध्य विवाह संपन्न हो सकता था ।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत विवाह की आवश्यक शर्तें –

अब हिंदू विवाह के लिए बाध्यता हेतु हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अंतर्गत जातियां उप जातियों में एकरूपता समानता आवश्यक नहीं है । हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में वैद्य हिंदू विवाह के लिए कुछ आवश्यक शर्तों का निर्धारण किया गया है जिसका निम्न शिक्षकों के अंतर्गत अध्ययन किया जा सकता है जो नीचे दिया जा रहा है ।

1. एक पत्नी विवाह -अधिनियम 1955 की धारा 51 के अनुसार एक वैद्य विवाह के लिए यह प्रथम आवश्यक शर्त है कि वर या वधू को जीवित पत्नियां पति पहले से ना हो । अर्थात पति या पत्नी के जीवित रहते उनमें से कोई भी अलग से विवाह नहीं कर सकता अगर विवाह संपन्न करता है तो दूसरा विवाह सुन सकता था अमान्य होगा इस प्रकार हिंदू विवाह अधिनियम 1955 बहू पत्नी विवाह पर प्रतिबंध लगाता है जो इस अधिनियम के पारित होने से पूर्व अनुमति देता था ।
इस प्रावधान के उल्लंघन में किए गए विवाह के पक्षकारों के लिए इस अधिनियम की धारा 17 में दंड का प्रावधान है दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि धारा 5(1) के उल्लंघन में एक जीवित दंपत्ति के रहते हुए किया गया विवाह न सिर्फ सुन्य तथा अमान्य है अपितु ऐसा करने वाला व्यक्ति भारतीय दंड संहिता की धारा 494, 495 के अंतर्गत द्पराध का दोषी होगा ।

2. पक्षकारों की सहमति हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5(2) के अंतर्गत वैद्य विवाह की द्वितीय शर्त प्रतिपादित की गई है इस अधिनियम को सन 1976 में संशोधन के पश्चात संपत्ति को या विवाह के पक्षकारों की सहमति को प्रधानता दी गई है इसकी शर्तें निम्न है ।

A- पागलपन के बार बार दौरे वर या वधू को नहीं आना चाहिए यदा-कदा कभी दौरे को संज्ञान में नहीं लिया जा सकता ।

B- जो व्यक्ति बौद्धिक शक्ति में इतना कमजोर हो कि वह सही बात मैं समझ सकता ।

C- विवाह के पक्षकारों वर तथा वधू को विकृत चित्र के कारण सहमति देने में सक्षम नहीं होना चाहिए

D- यद्यपि वर या वधू वैद्य सहमति देने में सक्षम है परंतु इस प्रकार के रोग से इस सीमा तक ग्रसित हैं कि वे विवाह के योग्य है तथा संतान उत्पन्न करने में सक्षम नहीं है ।

Hindu vivah adhiniyan 1955


विवाह की आयु हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 53 के अंतर्गत विवाह की आयु निर्धारित कर दी गई है वर्क की आयु अब बाल विवाह अवरोध अधिनियम 1978 के बाद 21 वर्ष तथा कन्या की आयु 18 वर्ष होनी चाहिए । संशोधन अधिनियम से पूर्व वर्ग की आयु 18 वर्ष तथा कन्या की आयु 15 वर्ष बीत की गई थी इस सर्द के उल्लंघन में विवाह न तो शुन्य होता है नहीं सुननी करणी अर्थात विवाह को किसी भी रूप में प्रभावित नहीं करता किंतु धारा 18 के अनुसार यह अपराध है वर्तमान में इस संबंध में 2007 के अधिनियम संख्या 6 की धारा 20 के द्वारा प्रतिस्थापित संशोधन में यह प्रावधान किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति जो धारा 5 के खंड 3 से उल्लेखित शर्तों का उल्लंघन करेगा ऐसे शर्तों के उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को 2 वर्ष का कठोर कारावास तथा ₹100000 तक के जुर्माने से या दोनों दंडित किया जा सकेगा ।

  • प्रतिबंधित डिग्री के ऊपर विवाह होना चाहिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 (4 )चौथी तथा पांचवी मिश्रित का प्रतिपादन करती है जो निम्न है ।

(क) विवाह की पक्षकार वर या वधू नातेदारी के अंतर्गत नहीं होने चाहिए परंतु यदि उसमें प्रतिबंधित नातेदारी में विवाह करने की प्रथा या रीति है तो यह शर्त लागू नहीं होगी ।
(ख) विवाह के प्रकार वर तथा वधू सपिंड नहीं होने चाहिए परंतु यदि उनके मध्य प्रतिनिधि प्रथा या रीति रिवाज के अनुसार सपिंड नातेदारी में भी विवाह की अनुमति है तो उन पर यह शर्त लागू नहीं होती है धारा 5(5)


शर्तों की उल्लंघन पर दंड की व्यवस्था ।

  1. धारा 5 की प्रथम सर्ग के उल्लंघन होने पर दो परिणाम उत्पन्न होते हैं –
    (क) धारा 11 के अनुसार विवाह आकृति एवं शून्य हो जाएगा ।
    (क) धारा 17 के अनुसार जो भी प्रकार शर्त का उल्लंघन करेगा भारतीय दंड संहिता की धारा 495 एवं 454 के अनुसार दंड का भागी होगा ।
  2. की धारा 5 के द्वतीय शर्त के उल्लंघन होने पर धारा 12 के अनुसार विवाह शून्य हो जाता है ।
  3. उसी संबंधित साहित्य के उल्लंघन पर विवाह किसी भी रूप में प्रभावित नहीं होता किंतु धारा 18 के अनुसार या अपराध है पूर्व में अपराधी पत्रकार का उसका दंड सादा कारावास 15 दिन का अथवा ₹1000 का जुर्माना अथवा दोनों हो सकता था किंतु वर्तमान में सन 2007 के अधिनियम की धारा 20 के द्वारा प्रतिस्थापित संशोधन में यह प्रावधान दिया गया कि यदि कोई जो धारा 5 के खंड 3 के निम्नलिखित शर्तो का उल्लंघन करेगा तो ऐसी शर्तों के उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को 2 वर्ष के कठोर कारावास से अथवा ₹100000 तक का जुर्माना या दोनों दंडित किया जा सकेगा ।
  4. व्यक्ति धारा 5 के खंड 4 एवं 5 के दिए गए उपबंध की प्रतिकूल विवाह करेगा धारा 11 के अंतर्गत संबंधियों एवं शॉपिंग के साथ विवाह करेगा तो शून्य करार दिया जाएगा तथा धारा 18 के अधीन इस प्रकार विवाह करने के दोष में दोषी पक्ष कार को एक महीने का साधारण कारावास अथवा ₹1000 तक का जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है ।

    क्या एक हिंदू लड़की मुसलमान से शादी कर सकती है-

    नहीं केवल तभी कर सकती है जब मुस्लिम पुरुष धर्म परिवर्तन करके हिंदू हो जाए क्योंकि हिंदू विवाह के लिए धार्मिक अनुष्ठान भी आवश्यक है हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 7 तथा मुस्लिम विधि भी इसकी अनुमति नहीं देती इससे भी लोग तभी वैद्य विवाह कर सकते हैं जब हिंदू लड़की अपना धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम धर्म अपना ले ।

Note- लेकिन वास्तव में धर्म की पाबंदियां अगर हटा दी जाए तो हिंदू और मुस्लिम दोनों एक साथ मिल कर अपना जीवन यापन कर सकते हैं जिसमें कोई कठिनाई नहीं होगी अगर वह पढ़े लिखे सभ्य समाज से हैं तो ।

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