About biology in hindi, जीव विज्ञान क्या है? (What is biology in hindi) जीवधारियो का वर्गीकरण, सभी सवालो के सुन्दर जवाब जिसे आप कभी नहीं भूलेंगे |

जीव विज्ञान ( Biology : Bios = life ; logos = discourse ) शब्द का प्रयोग सबसे पहले लैमार्क (Lamarck) और ट्रेवेरेनस (Treviranus) नामक वैज्ञानिक ने 1802 0 में किया था |

जीव विज्ञान (Biology)

“ विज्ञान की वह शाखा जो जीव धारियों के अध्ययन से जुड़ी हुई  हो जीव विज्ञान कहलाती है |

जीव विज्ञान क्या है?

“ विज्ञान की वह शाखा जो जीव धारियों के जैव क्रियायो का अध्ययन करती है, जीव विज्ञान कहलाती है |”

जीव विज्ञान में हम जीवो के संरचना विकास पहचान विवरण तथा वर्गीकरण के बारे में पढ़ते हैं आधुनिक जीव विज्ञान एक विस्तृत विज्ञान है जिसकी कई शाखाएं हैं |

जीव विज्ञान सभी जीव धारियों का सम्मिलित अध्ययन है, जिसके अंतर्गत पौधे तथा जंतु दोनों आते हैं, जहां पौधों के अध्ययन को वनस्पति विज्ञान तथा जीवो के अध्ययन को जंतु विज्ञान के नाम से जानते हैं |

 जीव विज्ञान  के  जनक है अरस्तु जी है 
थियोफ्रेस्ट्स (Theophrastus) को वनस्पति विज्ञान का जनक कहा जाता है |

Theophrastus (c. 371–287 BCE)

जीवन को परिभाषित करना बहुत कठिन है परंतु सभी जीव धारियों के कुछ विशेष लक्षण होते हैं जिसके आधार पर उन्हें निर्जीव वस्तुएं तथा सजीव वस्तुओं में पृथक कर दिया जाता है यह लक्षण निम्नलिखित है जो नीचे दिए गए हैं |

About biology in hindi

जीव धारियों के लक्षण ( Characteristics of Living Being )

जीवन चक्र सभी जीव एक निश्चित जीवन चक्र का अनुसरण करते हैं, उनका जन्म होता है और वह विकसित होते हैं, प्रजनन करते हैं, तथा अंत में वह वृद्धा अवस्था को प्राप्त करते हैं फिर उनकी मृत्यु हो जाती है अतः जीवों का एक क्रमबद्ध एवं विविध क्रियाओं से भरा एक जीवन चक्र होता है |

1. श्वसन ( Respiration )  

जीव धारियों में श्वसन हर समय होता रहता है, इस क्रिया में जीव वायुमंडल में मौजूद ऑक्सीजन को लेते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड को अपने शरीर से बाहर निकालते हैं तथा इस पूरी प्रक्रिया में कार्बोहाइड्रेट वसा एवं प्रोटीन का ऑक्सीकरण होता है और ऊर्जा मुक्त होती है इस मुक्त ऊर्जा से जीव धारियों की समस्त जैविक क्रियाएं संचालित होती हैं |

“ इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि बिना श्वसन के जीवन की कल्पना करना असंभव है “

2. पोषण ( Nuration )

जीव द्रव्य के निर्माण के लिए और जीव धारियों की वृद्धि एवं विकास के लिए भोजन की आवश्यकता होती है, पौधे पृथ्वी से जल खनिज पदार्थ और वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड लेकर पढ़ हरीम की सहायता से विभिन्न प्रकार के कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन का निर्माण करती हैं तथा जंतु पौधों द्वारा इनको प्राप्त करते हैं जिससे उनका जीवन सुचारु रुप से चलता रहता है |

3. वृद्धि ( Growth )

किसी जीवधारी की आकृति आयतन एवं शुष्क भार के बढ़ने को वृद्धि कहते हैं , यह सफल उपापचय एन का अंतिम परिणाम होता है सफल उपचयन में उपापचय क्रिया ए अपचाई क्रियाओं से अधिक होती हैं पौधों में वृद्धि अनिश्चित समय तक तथा निरंतर होती रहती है जबकि जंतुओं में यह विशेष अवस्था आने पर रुक जाती है उदाहरण के रूप में मानव की वृद्धि 20 वर्षों के उपरांत रुक जाती है, जबकि पौधों में यह वृद्धि उनके पूरे जीवन काल तक चलती रहती है |

4. प्रजनन (Reproduction)

जीव धारियों में अपने सामान जीव पैदा करने की क्षमता होती है जिससे हम प्रजनन कहते हैं, प्रत्येक जीवधारी अपने जीवन काल में अपने सामान संतानों की उत्पत्ति करता है | उसके बाद उनकी संताने प्रजनन करती हैं इसी प्रकार से चक्र चलता रहता है, और इस पृथ्वी जगत पर जीवो की मौजूदगी बनी रहती है इसे ही प्रजनन कहते हैं परंतु निर्जीव वस्तुओं में ऐसा देखने को नहीं मिलता है |

5. गति (Motion)

गति जीव धारियों का प्रमुख लक्षण है जंतु भोजन की तलाश में अनुकूल या वातावरण की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए गमन करते हैं जो गति कहलाती है, इसी प्रकार से उच्च वर्ग के पौधों में उनके शरीर का कोई भाग जैसे जड़ तना एक ओर मुड़ जाता है इसे भी गति कहते हैं लेकिन निर्जीव वस्तुओं में केवल प्रभावित गति ही पाई जाती है |

6. अनुकूलन

जीवधारी जहां पर रहते हैं अपने वातावरण के साथ निरंतर होने वाले परिवर्तनों के साथ अंतः क्रिया करते रहते हैं | जिसके अनुसार उनकी संरचना और क्रियाओं में परिवर्तन आते हैं जिन्हें अनुकूलन शीलता कहते हैं अनुकूलन शीलता जीव धारियों को वातावरण के साथ समन्वय बिठाने में उचित मदद प्रदान करती हैं |

7. उत्सर्जन  (Excretion)

उत्सर्जन सभी जीव धारियों में विविध उपापचय क्रियाओं के फलस्वरूप जल और कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं वरन अन्य प्रकार की अनावश्यक वह हानिकारक पदार्थ भी बनते रहते हैं | इन पदार्थों को जीवधारी निरंतर अपने शरीर से निष्कासित करते रहते हैं इस पूरी प्रक्रिया को ही उत्सर्जन कहा जाता है |

8. उपापचय (Metabulism)

उपापचय सभी जीव धारियों में हर समय अनेक रासायनिक और भौतिक क्रियाएं होती रहती हैं, इसमें ऊपर चाहिए क्रियाएं रचनात्मक होती हैं | तथा सरल पदार्थों से जटिल पदार्थ बनते हैं जो जीव द्रव्य के घटक होते हैं इसके विपरीत अपचाई क्रियाएं भी होती रहती हैं जिसमें जटिल पदार्थों के विघटन से तरल पदार्थ बनते हैं उपचयन और अपचयन क्रियाओं के मिले संपूर्ण रूप को उपापचय कहते हैं |

9. कोशा संरचना (Cell Structure)

कोशा संरचना सेल स्ट्रक्चर जीवधारी एक या एक से अधिक संरचनात्मक इकाई यों से मिलकर बने होते हैं जिन्हें कोशिका कहते हैं, पौधों और जंतुओं की सभी को कोशिका में जीव द्रव्य कोशा कला द्वारा घिरा रहता है, पौधो में इसके अतिरिक्त कोशा कला के बाहर एक निर्जीव कोशा भित्ति (Cell Wall ) भी होती है  |

10. जीव द्रव्य  (Protoplasm)

जीव द्रव्य जीव धारियों में वास्तविक जीवित पदार्थ जीव द्रव्य ही है, यही जीवधारी की भौतिक आधारशिला है | जीव द्रव्य में सभी जैविक क्रियाएं होती हैं, जीव द्रव्य में होने वाले रासायनिक व भौतिक परिवर्तन और जीव द्रव्य व वातावरण के बीच आदान-प्रदान की क्रियाएं ही जैविक क्रिया कहलाती हैं |

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जीव धारियों का वर्गीकरण  ( Classification of living beings)

समस्त जीव धारियों को सरलता के लिए हम पौधों और जंतुओं में विभाजित करते हैं, ( R. H Whittaker ) द्वारा प्रस्तुत वर्गीकरण सबसे ज्यादा उपयुक्त माना जाता है, R. H Whittaker साहब ने जीव धारियों को निम्नलिखित 5 जगहों में विभाजित किया है |

मोनेरा (Monera )

इस जगत में सभी प्रोकैरियोटिक जीव को रखा गया जैसे – जीवाणु , साइनोबैक्टीरिया आदि |

Bacteria

2. प्रोटीस्टा (Protista )

ये एक कोशकीय तथा कुछ कॉलोनियल होते हैं इनमें पूर्ण विकसित केंद्रक पाया जाता है | यूकैरियोटिक जैसे- अमीबा, युग्लिना इत्यादि |

3. प्लांटी (Plantae)

यह बहुकोशिकीय जीवधारी होते हैं इनमें प्रायः पौधों को रखा जाता है, इनकी कोशाओ में चारों ओर सेलुलोज की कोशा – भित्ति होती है, व् कोशाओ में रिक्तिका भी पाई जाती है | यह प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपने लिए भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं अर्थात स्वपोषी होते हैं, जैसे- हरे शैवाल, बीज वाले पौधे आदि |

4. एनिमलिया (Animalia )

एनिमलिया (Animalia )  बहूकौशिकी जंतु होते हैं, इनमें प्रकाश संश्लेषण नहीं पाया जाता और ना ही Cell Wall मौजूद होती है, यह यूकैरियोटिक तथा परजीवी होते हैं |

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