टीवी का इलाज कितने दिन चलता है, tuberculosis-in-hindi टीवी के बारे में सम्पूर्ण जानकारी |

Tb का इलाज सामान्य स्थिति में 9 से 12 माह और ज्यादा गंभीर स्थिति में करीब 24 माह चलता है। tuberculosis-in-hindi सभी जांचें सरकारी अस्पताल में मुफ्त होती हैं, टीबी होने पर शरीर में गांठ निकलने के बाद जब इलाज शुरू होता है तो और भी गांठें निकलने लगती हैं। ये बाते

क्षय रोग एक विशेष कीटाणु से उत्पन्न होने वाला रोग है । हमारे चिकित्सकों को प्राचीनकाल में भी इस रोग की अच्छी जानकारी थी । वे इसे यक्ष्मा या राजरोग के नाम से जानते थे । इस रोग से ग्रसित रोगी प्रायः मर जाते थे । सर्वप्रथम 1882 में वैज्ञानिक राबर्ट कोच ने यह सिद्ध किया कि यह रोग एक कीटाणु से होता है । चूंकि यह कीटाणु छोटे – छोटे उभार अंग में उत्पन्न करता था इसीलिए उन्होंने इस कीटाणु को ट्युबरकल बेसीलाई नाम दिया । इसी कारण इस कीटाणु से होने वाले रोग को ट्युबर क्यूलोरोसिस या टी.बी. भी कहा गया । वर्तमान समय में क्षय रोग को बोलचाल की भाषा में टी.बी. कहते हैं ।

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रोग का विस्तार

 क्षय रोग पूरे विश्व में पाया जाता है । विकसित देशों इंग्लैण्ड , अमेरिका , कनाडा , जापान आदि देशों में पिछले चालीस वर्षों में यह रोग नियंत्रित हो गया है । किन्तु विकासशील देशों जैसे दक्षिण अफ्रीका , पाकिस्तान , बंगलादेश , श्रीलंका , चीन तथा भारत वर्ष में अभी भी यह रोग घातक स्थिति में है । यहाँ लाखों लोग प्रतिवर्ष इस रोग की चपेट में आकर मर जाते हैं ।

अनुमान के अनुसार विश्व की एक तिहाई जनसंख्या में इस रोग के कीटाणु का संक्रमण है । पूरे विश्व में एक अनुमान के अनुसार नब्बे लाख लोग इस रोग से नये ग्रसित थे । विश्व में लगभग तीस लाख व्यक्तियों की इस रोग से मृत्यु की सम्भावना प्रतिवर्ष रहती है ( वर्ष 1995 आकलन ) । भारत वर्ष में इस रोग की भयानकता इस बात से समझी जा सकती है कि लगभग पांच लाख लोग प्रतिवर्ष इस रोग से मरते हैं । विश्व के कुल टी.बी. रोगियों की आधी संख्या भारत वर्ष , बंगलादेश , पाकिस्तान में निवास करती है ।

क्षय रोग का कारण

क्षय रोग एक विशेष प्रकार के कीटाणु द्वारा शरीर में होता है । इस कीटाणु को माइको बैक्टीरियम कहते हैं । इसकी कई प्रजाति हैं । मनुष्य में मुख्य रूप से माइको बैक्टीरियम होमिनिस प्रजाति तथा माइको बैक्टीरियम बोविस ( पशुओं में भी पाया जाता है ) के कारण रोग होता है । ऐसे यह कीटाणु पक्षियों , गाय , बन्दर आदि में भी रोग उत्पन्न करता है । मनुष्य में इस रोग के कीटाणु शरीर के लगभग प्रत्येक भाग पर बीमारी पैदा करते हैं । जैसे – फेफड़े , हड्डी , त्वचा , लसीका ग्रन्थि , छोटी तथा बड़ी आंत , दिमाग आदि ।

क्षय रोग का प्रसार

क्षय रोग या टी.बी. जैसा कि आपने पढ़ा , एक कीटाणु द्वारा फैलने वाला रोग है । ये कीटाणु रोगी के फेफड़ों या ग्रसित अंगों में बहुतायत से बढ़ते रहते हैं । मरीज के खाँसने से या कीटाणु स्राव द्वारा यह रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलता है ।

खाँसने से प्रसार –

इसका रोगी , जिसको फेफड़ों में बीमारी हो , खाँसता है ; तब हवा में ये कीटाणु फैल जाते हैं । आपने देखा होगा कि छींक आने या खाँसने से छोटी – छोटी लार की बिन्दुकाएँ इधर – उधर बिखरती हैं । यदि क्षय रोगी खुले में खाँसता है तब भी यही बिन्दुकाएँ हवा में उड़ने लगती हैं । इन्हीं में रोग के कीटाणु होते हैं ।

जब कोई स्वस्थ व्यक्ति पास में साँस लेता है , तब यही बिन्दुकाएँ जिनमें कीटाणु हैं , उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं । वहाँ पहुँचकर ये श्वांस नली या फेफड़ों में स्थापित हो जाते हैं और अनुकूल परिस्थिति पाकर बढ़ने लगते हैं । रोगी के स्राव से फैलाव – क्षय रोगी के थूक में स्थित कीटाणु दूसरे व्यक्ति की त्वचा आदि पर भी संक्रमण कर सकते हैं । दूध से प्रसार – गायों में भी यह रोग पाया जाता है । यदि रोगी गाय का दूध , जिसमें यह कीटाणु होता है , स्वस्थ व्यक्ति पी लेता है तो ये कीटाणु व्यक्ति की आंतों में पहुंच जाते हैं और वहाँ आंत का रोग उत्पत्र करते हैं ।

शरीर के भीतर रोग का प्रसार –

एक बार व्यक्ति में यह रोग पहुंच जाता है , तब यह रक्त द्वारा या लसीका तंत्र द्वारा शरीर के दूसरे भागों में भी पहुंच जाता है । जैसे , आंत की टी.बी. से बच्चेदानी में प्रसार , फेफड़े या लसीका ग्रन्थि से रीढ़ की हड्डी या दिमाग की झिल्ली या मस्तिष्क में यह रोग फैल सकता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि क्षय रोग का प्रसार रोगी से स्वस्थ मनुष्य को कैसे होता है एवं रोग का प्रसार एक अंग से दूसरे अंग या भाग तक कैसे होता है ।

रोग उत्पन्न होने के अन्य सहायक कारण

किसी व्यक्ति में केवल क्षय रोग के कुछ कीटाणु प्रविष्ट हो जाने से ही रोग उत्पत्र नहीं हो जाता है । रोग होना या न होना कई अन्य बातों पर निर्भर करता है । इन कारणों को रोग होने का सहायक कारण कहते हैं । यदि ये सभी सहायक कारण हों किन्तु रोग उत्पन्न करने का कीटाणु शरीर में न हो तो रोग नहीं हो सकता है । हम आगे इसी बात का विस्तार से अध्ययन करेंगे । इन कारणों या स्थितियों को जिनसे रोग उत्पन्न होने की सम्भावना अधिक होती है रोग की अनुकूल परिस्थिति भी कह सकते हैं ।

क्षय रोग की अनुकूल परिस्थितियाँ

प्रतिरोधी क्षमता की कमी – हमारे शरीर में कई रोगों के कीटाणु प्रविष्ट करते रहते हैं । किन्तु हमारा शरीर उन्हें नष्ट करता रहता है । यह विशेष प्रकार की कोशिकाओं के कारण होता है । जिसके कारण हम प्रायः रोग से बचे रहते हैं । इस प्रकार हमारे शरीर की कुछ कोशिकाएं हमें रोग से बचाती रहती हैं ।

इस प्रकार रोग से बचने या रोग को परास्त करने को प्रतिरोधी क्षमता कहते हैं । यदि किसी व्यक्ति के शरीर की प्रतिरोधी क्षमता कमजोर होती है और उसके भीतर रोग के कीटाणु प्रवेश किए हुए हैं तब वह व्यक्ति रोग की चपेट में आ जाता है । इस रोग से लड़ने की क्षमता के कमी के कई कारण होते हैं । जैसे — पौष्टिक आहार का न मिलना , प्रदूषित या अशुद्ध वातावरण में निवास करना ; जन्म से ही किसी ऐसी बीमारी का होना जिससे रोग से लड़ने की क्षमता न बढ़े , अधिक तनाव का होना , मधुमेह ( चीनी ) की बीमारी का होना ; एड्स ( यौन जनित एक रोग ) का होना आदि बहुत से कारण हैं ।

पौष्टिक आहार की कमी – पौष्टिक आहार न मिलने से एक ओर रोग से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है , दूसरी ओर व्यक्ति का समुचित विकास भी नहीं होता । बीमारी होने की दशा में भी व्यक्ति शीघ्र उसके दुष्यभावों के चपेट में आ जाता है ।

प्रदूषण या अशुद्ध वातावरण –

 प्रदूषित वातावरण में देखा जाता है कि व्यक्ति की प्रतिरोधी क्षमता कम हो जाती है । इसके साथ ही व्यक्ति रोग का शीघ्र शिकार हो जाता है तथा बीमारी या रोग में भी लाभ धीरे – धीरे ही होता है ।

भीड़ या व्यक्तियों का समूह में रहना

 यदि एक छोटे – से कमरे में कई व्यक्ति एक साथ सोते हैं और किसी एक व्यक्ति को क्षय रोग हो तब बहुत ही शीघ्र वह सभी साथ रहने वालों को हो सकता है । इसलिए रोग के फैलने में एक कमरे में या भीड़ की जगह में रहना भी सहायक होता है ।

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अन्य बीमारियों का होना –

कुछ अन्य बीमारियाँ जैसे – मधुमेह , एड्स ; कई प्रकार के रक्त कैंसर में व्यक्ति पहले से ही कमजोर रहता है । इन व्यक्तियों की प्रतिरोधी क्षमता कम होती है । इसी से इन्हें क्षय रोग होने की अधिक सम्भावना होती है । इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि क्षय रोग तभी होता है जब व्यक्ति के भीतर क्षय रोग का कीटाणु प्रवेश करता है तथा क्षय रोग उत्पन्न होने की सहायक या अनुकूल परिस्थितियाँ भी रहती हैं ।

क्षय रोग के कीटाणु टी.बी. या क्षय रोग जैसा कि आप पहले पढ़ चुके हैं . एक कीटाणु से होता है । इसे माइको बैक्टीरियम ट्युबर कुलोसिस कहते हैं । इसकी दो प्रजातियाँ माइको बैक्टीरियम होमिनिस तथा माइको बैक्टीरियम बोविस मनुष्य में मुख्यतयः रोग फैलाने का काम करती हैं । यह कीटाणु छड़ के आकार का होता है ।

यह कीटाणु लगभग 14 u ( 1000 मि.मी. ) बड़ा होता है । इसकी संरचना में यह मुख्य बात है कि इसके चारों ओर एक मोटी वसा तथा ग्लूकोज़ की परत होती है । इसकी दीवार में कुछ विशिष्ट प्रकार के तत्त्व होते हैं जिन्हें रंगक कार्बाल फुश्चिन से रंगने पर यह सूक्ष्मदर्शी यंत्र में लाल रंग का दिखायी देता है । इस प्रकार इसे रोगी के थूक या रोगी के रोग ग्रसित अंग के स्राव में आसानी से पहचाना जा सकता है । कभी कभी ये सीधी छड़ की जगह थोड़ा एक सिरे पर मुड़े हुए भी दिखायी देते हैं ।

क्षय रोग – यह कीटाणु शरीर में प्रवेश करने के बाद ऊतकों तथा कोशिका के भीतर अपनी वंश – वृद्धि करता रहता है । इस प्रकार अपनी संख्या में अत्यधिक बढ़ोत्तरी करके यह ऊतक तथा कोशिका को नष्ट कर देता है । ऊतक के क्षय से भीतर मवाद या गड्ढे बन जाते हैं । इसी प्रकार उस ऊतक में सूजन या प्रदाह उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार यह कीटाणु शरीर के विभिन्न अंगों में रोग उत्पन्न करता है ।

क्षय रोग के लक्षण

सभी क्षय रोग के रोगियों में कुछ सामान्य लक्षण पाये जाते हैं । विशेषकर ऐसे रोगियों में जिन्हें फेफड़ों की बीमारी होती है । उन सभी रोगियों में निम्न लक्षण पाये जाते हैं

1. खाँसी – यदि किसी व्यक्ति को तीन सप्ताह या उससे अधिक दिनों से खाँसी आ रही है तब उसका परीक्षण क्षय रोग के लिए करना चाहिए । खाँसी के साथ बलगम या खून के छींटे आते हैं ।

2. बुखार – सभी क्षय रोगियों को हल्का बुखार शाम या रात को आता है । यह बुखार प्रायः लम्बे समय से रहता है ।

3.भूख में कमी – भूख में कमी होने लगती है तथा व्यक्ति का वजन कम होने लगता है ।

टी.बी. के रोगियों में लम्बे समय तक खाँसी तथा हल्का बुखार बना रहता है । खाँसी के साथ बलगम या खून आता है । साथ ही मरीज को भूख लगनी कम हो जाती है तथा उसका वजन कम होने लगता है जिससे मरीज क्रमशः कमजोर होता जाता है ।

क्षय रोग का उपचार

क्षय रोग का उपचार अत्यन्त प्रभावी होता है । वर्ष 1930 के पहले इस रोग की कोई विशेष दवा उपलब्ध नहीं थी । वर्तमान में इस रोग की बहुत – सी दवाएँ उपलब्ध हैं । यदि इन दवाओं को उचित समय तक लिया जाए तो क्षय रोग निश्चित रूप से ठीक हो जाता है ।

क्षय रोग की दवाएँ – इस रोग की कई दवाएँ जैसे आइसोनेक्स , इथमबुटाल , रिफैम्पसीन , स्ट्रेप्टोमाइसीन , इथिमोनामाइड , पास , साइकलोसिरीन , थायसिटाजोन आदि होती हैं ।

उपचार में सावधानी –

क्षय रोग का उपचार सभी सरकारी चिकित्सालयों में निःशुल्क उपलब्ध है । इसको प्रत्येक जिले में सुचारु रूप से नियंत्रित करने हेतु जिला क्षय रोग नियंत्रण इकाई की स्थापना की गयी है । इसके साथ ही प्रत्येक मेडिकल कालेज में इस रोग के विशेष परामर्श एवं उपचार हेतु एक अलग विभाग भी रखा गया है । क्षय रोग का उपचार 6 माह से 12 माह तक रोग के अनुसार किया जाता है । रोग का उपचार पूरे समय तक नियमित किया जाना चाहिए । बीच में उपचार नहीं छोड़ना चाहिए नहीं तो कीटाणुओं पर दवा का असर खत्म हो जाता है । दवा नियमित करने से टी.बी. के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं तथा रोगी स्वस्थ हो जाता है ।

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